दल-बदल निषेध कानून , dal badal virodhi ya nishedh kanoon , Anti defection law in hindi

By   December 17, 2019

Anti defection law in hindi , दल-बदल निषेध कानून , dal badal virodhi ya nishedh kanoon :-
भारतीय संसदीय व्यवस्था में स्थायित्व के तत्व को सुदृढ़ करने तथा
राजनीतिक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने हेतु 52 वें संविधान संशोधन
अधिनियम द्वारा अनुच्छेद (101) (102) (190) तथा (191) में संशोधन
किया गया तथा एक नई अनुसूची (10 वीं अनुसूची) को जोड़ा गया।
इसके द्वारा संसद तथा राज्य विधायिकाओं में स्थानों का रिक्त होना,
सदस्यता के लिए निरर्हताएं तथा दल बदल के आधार पर निरर्हता के
बारे में उपबंध किया गया। दसवीं अनुसूची में पुनः 91 वें संविधान
संशोधन द्वारा बदलते राजनीतिक धटनाओं के सापेक्ष बदलाव किए गए
हैं। वर्तमान समय में दसवीं अनुसूची में निम्नलिखित प्रावधान सम्मिलित हैं।
;पद्ध संसद या राज्य विधायिका का कोई सदस्य, जो किसी राजनीतिक
दल का सदस्य है, सदन का सस्दय होने के लिए उस दशा
में निरर्हित होगा यदि उसने ऐसे राजनीतिक दल की अपनी
सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ दी है या वह ऐसे राजनीतिक दल
द्वारा, जिसका वह सदस्य है, दिए गए आदेश के विरूद्व सदन
में मतदान करता है या मतदान करने से विरत रहता है और
ऐसे मतदान या विरत रहने को राजनीतिक दल ने मतदान या
विरत रहने की तारीख से 15 दिन के भीतर माफ नहीं किया है।
;पपद्ध निर्दलीय सदस्य के रूप में निर्वाचित सदस्य सदन की सदस्यता
से निरर्हित होगा यदि उसने ऐसे निर्वाचन के पश्चात् किसी
राजनीतिक दल में सदस्यता ग्रहण कर ली है।
;पपपद्ध नामनिर्देशित सस्दय, सदन का सदस्य होने के लिए निरर्हित
होगा यदि वह सदन के सदस्य के रूप में शपथ ग्रहण करने
के पश्चात् अपना स्थान ग्रहण करने की तारीख से छह मास
की समाप्ति के पश्चात् किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो
जाता है।
;पअद्ध सदन का कोई सदस्य सदन की सदस्यता से तब निरर्हित नहीं
होगा जब उसके मूल राजनीतिक दल का किसी अन्य राजनीतिक
दल में विलय हो जाता है। किसी सदस्य के मूल राजनीतिक
दल का विलय हुआ तभी समझा जाएगा जब सबंधित
विधान-दल के कम से कम दो तिहाई सदस्य ऐसे विलय के
लिए सहमत हो गए हैं।
;अद्ध कोई व्यक्ति, जो लोक सभा के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष अथवा
राज्य सभा के सभापति या उपसभापति अथवा राज्य विधान
सभा के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष या राज्य विधान परिषद के
सभापति या उपसभापति के पद पर निर्वाचित हुआ है, सदन की
सदस्यता से निरर्हित नहीं होगा यदि –
(क) वह पद पर रहने के दौरान अपना राजनीतिक दल छोड़
देता है लेकिन किसी दुसरे राजनीतिक दल में शामिल नहीं
होता।
(ख) वह पद पर रहने के दौरान अपना राजनीतिक दल छोड़
देता है और ऐसे पद पर न रहने के पश्चात् उसी राजनीतिक
दल में पुनः सम्मिलित हो जाता है जिसके सदस्य के रूप
में वह सदन का सदस्य निर्वाचित हुआ था।
;अपद्ध (क) यदि यह प्रश्न उठता है कि सदन का कोई सदस्य इस
अनुसूची के अधीन निरर्हता से ग्रस्त हो गया है या नहीं तो
वह प्रश्न, ऐसे सदन के यथास्थिति, सभापति या अध्यक्ष के
विनिश्चय के लिए निर्देशित किया जाएगा और उसका
विनिश्चय अंतिम होगा। परन्तु यदि यह प्रश्न उठता है कि
सदन का अध्यक्ष या सभापति निरर्हता से ग्रस्त हो गया है
या नहीं वहाँ वैसे सदस्य को निर्देशित किया जाएगा जिसे
सदन चुनें।
सदन का सभापति या अध्यक्ष, इस अनुसूची के उपबंधों को
क्रियान्वित करने के लिए नियम बना सकेगा। नियम सदन
के समक्ष अनुमोदन या अननुमोदन के लिए रखा जाएगा।
(ख) इस अनुसूची के अधीन निरर्हता संबंधी किसी प्रश्न के
संबंध में सभी कार्यवाहियाँ अनुच्छेद (122) के अर्थ में संसद की
तथा (212) के अर्थ में राज्य विधान मंडल की कार्यवाहियाँ
समझी जाएंगी।
;अपपद्ध इस संविधान के किसी बात के होते हुए भी, किसी न्यायालय
को इस अनुसूची के अधीन सदन के किसी सदस्य की
निरर्हता से संबंधित किसी विषय के बारे में कोई अधिकारिता
नहीं होगी।
परन्तु दसवीं अनुसूची के पैरा सात को, जो कि निरर्हता सबंधी
प्रश्न पर न्यायालय की आधिकारिता निर्बंधित करता है को, पंजाब
एवं हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा शून्य घेाषित कर दिया गया था
जिसे बाद में कीहोतो होलियन बनाम जैक्चुलियु वाद, 1993 में
उच्चतम न्यायालय के समक्ष लाया गया। उच्चतम न्यायालय ने
दल-बदल निषेध सबंधी संविधान संशोधन को आवश्यक राज्यों से
पारित नहीं कराए जाने पर प्रश्न-चिन्ह लगाया। साथ हीं अध्यक्ष
या सभापति के इस संदर्भ मंे अधिकारिता को न्यायिक पुनरीक्षण के
अधीन होने की बात कही। निरर्हरता संबंधी प्रश्न की कार्यवाहियाँ
सदन की सामान्य कार्यवाहियों के रूप में नहीं समझी जा सकती,
इसलिए ये न्यायिक समीक्षा से अलग नहीं रखी जा सकती हैं।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि निरर्हता के प्रश्न पर विचार करते
वक्त अध्यक्ष या सभापति क्योंकि एक न्यायाधिकरण के रूप में कार्य
करता है इसलिए उसका निर्णय अन्य न्यायाधिकरणों की भँाति
न्यायिक समीक्षा के अधीन होंगे।

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